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बीए सेमेस्टर-3 चित्रकला प्रथम प्रश्नपत्र

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2022
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2676
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-3 चित्रकला प्रथम प्रश्नपत्र

प्रश्न- "गुप्तकालीन कला को भारत का स्वर्ण युग कहा गया है।" इस कथन की पुष्टि कीजिए।

उत्तर -

भारत का स्वर्ण युग
(गुप्तकालीन कला)

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि किसी राष्ट्र अथवा राज्य में सामाजिक व सांस्कृतिक उत्थान - पतन का वहाँ के राजनैतिक वातावरण (चेतनाओं और कुण्ठाओं) से गहरा सम्बन्ध होता है। गुप्त वंश के राजाओं के शासनकाल में राजनैतिक व सांस्कृतिक उत्थान का प्रगतिशील स्वरूप दृष्टिगत होता है। सम्राट स्कन्दगुप्त, समुद्रगुप्त व चन्द्रगुप्त आदि का समय इतना समृद्धशाली था कि उनके शासनकाल में मानव जीवन का सर्वतोमुखी विकास हुआ और वह युग स्वर्ण युग कहलाया। चित्रकला, मूर्तिकला व वास्तुकला का अधिकतम उत्कर्ष इसी काल में हुआ। गुप्तवंशीय सम्राटों का साहित्य और कला - प्रेम उल्लेखनीय है। देश-विदेश के विद्वानों, साहित्यकारों व कलाकारों के लिये गुप्त राज्य आकर्षण का केन्द्र था। जनता व शासक दोनों से ही उन्हें अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। उस युग में चित्रकला व मूर्तिकला की परम्परायें अत्यन्त परिष्कृत स्तर पर पहुँच गई थीं। ई. शताब्दी के उदय के साथ प्राचीन काल की भारतीय कला के इतिहास में स्वर्ण युग प्रस्फुटित होता दिखाई पड़ता है। इस समय बौद्ध धर्म अपना प्रभाव स्थापित कर रहा था और दलित, दरिद्र जनता बौद्ध धर्म ग्रहण कर रही थी। बौद्ध धर्म की यह उन्नति और व्यापकता सातवीं ईसवीं शताब्दी तक भली प्रकार चलती रही। इस समय तक ब्राह्मण धर्म पुनः उन्नति को प्राप्त नहीं कर पाया। इस समय भारत पूर्वी देशों में एक अग्रगण्य (अग्रणी) और समृद्धशाली देश था और उसके ज्ञान तथा विज्ञान की ज्योति सम्पूर्ण एशिया को प्रकाशित कर रही थी। समस्त एशियाई देश धार्मिक, प्रेरणा और ज्ञान प्राप्ति हेतु बौद्ध भारत की ओर दृष्टि लगाये हुये थे। इस समय भारतवर्ष में पवित्र तीर्थ कौशल के दर्शन हेतु दूर-दूर से असंख्य पर्यटक आते थे और भगवान बुद्ध के उपदेश समस्त पूर्वी देशों में अपनाये जा रहे थे। बौद्ध धर्म की सहिष्णुता और उदारता के कारण भारत को ख्याति प्राप्त हो रही थी। भारतवर्ष का यह स्वर्ण युग था।

इस समय भारतीय संस्कृति को एक नवीन चेतना प्राप्त हुई और देश के समस्त भागों में ज्ञान और दर्शन का विकास हुआ, किन्तु बौद्ध धर्म का प्रभाव संस्कृति के किसी भी अन्य पक्ष पर उतना गहरा नहीं दिखाई पड़ता है जितना चित्रकला पर दिखाई पड़ता है। बौद्ध धर्म का पूर्वी देशों जैसे श्री लंका, जावा, श्याम, ब्रह्मा, नेपाल, खोतन, तिब्बत, जापान और चीन की कला पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ा। इन सब देशों की चित्रकला, मूर्तिकला एवं वास्तुकला के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं। तारानाथ, जो सोलहवीं शताब्दी का तिब्बती इतिहासकार था, ने यह उल्लेख किया है कि जहाँ-जहाँ बौद्ध धर्म फैला वहाँ-वहाँ दक्ष चित्रकार मिले। यह विशेष रूप से भारतवर्ष की चित्रकला में स्पष्ट परिलक्षित है। यद्यपि बहुत सी सुन्दर कलाकृतियाँ समयानुसार नष्ट हो गईं। फिर भी बौद्ध, भागवत तथा शैव्य कलाकारों की कुछ समुचित कृतियाँ कलाकारों की निपुणता तथा कारीगरी की दक्षता की गाथा को छिपाये आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में प्राप्त हैं। इन्हीं कलादक्ष शिल्पियों ने चित्रकला की एक विशिष्ठ शैली स्थापित की। भारत की परम्परा के अनुसार शिल्प विज्ञान का शास्त्र भी मौखिक पद्धति रूप में वंशानुगत चलता रहा। गुप्तकाल में शिल्पशास्त्र, ग्रन्थों के रूप में संकलित हुये। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में चित्रसूत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस युग के कला निर्देशन आज भी कलाकारों के लिये अनुकरणीय हैं और शिल्पी आदर्श रूप में पालन करते हैं। .

गुप्त राजाओं के समय शिल्प एवं कला चरमोत्कर्ष पर थी। सौन्दर्य एवं कला जीवन में इतनी समाविष्ट हो चुकी थी कि वह अपने युग की सर्वाङ्गपूर्ण कृतियों की तन्मयता में डूबकर साकार हुई। मौर्यकालीन रूढ़ कला परम्पराओं का अतिक्रमण कर कला-चेतना सुन्दर अतीत के गौरव से मंडित प्रकाश की दीप्ति से जगमगा उठी। तत्कालीन कला में भावना का उदात्त आरोहण पद पद पर परिलक्षित होता है। समस्त आनन्द और उल्लास, साधना और तल्लीनता, स्फूर्ति और अंत: शक्ति उभरकर भारतीय कला के स्वर्णिम विहान की प्रभा को अजंता के अंतर्पटल में रूपायित कर रही है। यद्यपि दो सहस्र वर्षों के थपेड़ों की मार उसने सही, परन्तु आज भी कला - साधनों के प्राणों की धड़कन वहाँ की रंगीन रेखाओं और निर्भर संकेतों में लहर सी उठती है। समय की निर्बाध असीमता भी धूमिल प्रकाश में सिहरते उन अगणित रंगों का सुषमा- कोष न मिटा सकी जो कला की गति में एकाकार-सा लगता है। जैसे चरम निर्माण वहाँ के कण-कण में मूर्तिमान हो उठा हो, निराकार और साकार रूप अनगढ़ शिलाखण्डों में रूपवान हो उठा हो, आन्तरिक प्रेरणा की मनुहारी छैनी और हथौड़ों की चोटों से गूंजकर बिखर गई हो। दक्षिण भारत और उत्तर भारत की मूर्तिकला में पर्याप्त भिन्नता दिखाई पड़ती है फिर भी भाव मुद्राओं और आसनों की अभिव्यक्ति के लिए गुप्तकालीन शिल्प विज्ञान आज भी कलाकारों के लिये अनुकरणीय है। भावमयी मुद्राओं का जितना मार्मिक और हृदयग्राही अंकन गुप्तकालीन अजन्ता की गुफाओं में हुआ है, उतना किसी अन्य युग की कला में नहीं है। रसों की अभिव्यक्ति में अजन्ता के चित्र अद्वितीय हैं। चिन्तामणिकर ने लिखा है कि "गुप्तकालीन कला के सिद्धान्तों के निर्देशनों का बिना किसी परिवर्तन के आज भी भारत में पालन किया जाता है।"

अजन्ता गुप्तकालीन कला का ज्योतिर्मय आवास है। चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य कला तीनों में लोकोत्तर सौन्दर्य मुखरित होकर कला की सत्ता में तिरोहित हुआ-सा जान पड़ता है। वहाँ का सम्पूर्ण वातावरण इतना कलामय और भव्य है कि भावना के सूक्ष्म अवगुंठनों में झाँकती इस रहस्यमयी कला सृष्टि को देखकर आज भी मनुष्य आश्चर्य से मूक रह जाता है। कलाकारों ने अपने अंतर (मन) में संचित सम्पूर्ण सुषमा, सौन्दर्य, कोमलता इन पत्थर की सुदृढ़ प्राचीरों पर उड़ेल दी है। स्वप्नों का यह छायालोक मानों जीवन्त हो उठा है। जीवन का उल्लास, अमर प्राणों के ये हल्के गहरे सिहरते रंग इस अद्भुत रूप कल्पना में प्रतिबिम्बित होकर कला के अतल में समा जाने के लिये मचल रहे हैं। कला का यह तीर्थस्थल अजंता हैदराबाद के उत्तरी-पश्चिमी कोण पर औरंगाबाद जिले से 68 मील की दूरी पर स्थित है। सर्पाकार बाछोरा नदी को पार करके ही वहाँ प्रवेश किया जा सकता है। इन गुफाओं की संख्या 29 है जो पहाड़ियों को काटकर अर्द्धगोलाई लिये निर्मित हुई हैं। इन गुफाओं के चतुर्दिक पहाड़ की उच्च प्राचीरें (दीवारें) हैं और अन्दर बने चैत्य, विहार, स्तूप, सभा मण्डप इत्यादि बौद्ध साधकों की एकान्त स्वर्गिक प्रेरणा का आभास करा रहे हैं। सम्भव है प्राचीन काल में कुछ बौद्ध भिक्षु यहाँ भ्रमण करते हुए आ गये और एकान्त चिंतन व कठिन तप के लिये उन्हें यह स्थल उपयुक्त लगा हो। ऐसा भी सम्भव है कि गुफायें पहले से हों और बौद्ध भिक्षुओं ने वातावरण में रम्यता और चारुता लाने के लिए उन्हें इस तरह चित्रों से अलंकृत किया हो।

लगभग द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व अजंता की गुफाओं का निर्माण आरम्भ हुआ जो 600- 700 सदी ई. तक जारी रहा। निर्जन, नीरव पहाड़ी चट्टानों में किस प्रकार कमरों को काटा जाय, 1. प्रत्येकं स्तम्भ और स्तूप की स्थिति कैसी हो और ये संख्या में कितने और किस क्रम में हों, जिन गुहाओं में अधिकतर भिक्षुओं का निवास हो, उनमें तथागत (बुद्ध) की जीवन-चर्याओं को कैसे प्रदर्शित किया जाये तथा उपासना गृहों की तरह प्रयुक्त चैत्यों को आकर्षक बनाने के लिए किस पद्धति और रंगों के उपकरण से निर्जीव दीवारों में जीवन रस ढाला जाये, साथ ही कैसे अजंता के चित्राधार में अमिट रंगों को तद्रूप किया जाये जो देखते ही मन को आकर्षित कर लें, इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान सैकड़ों वर्षों की साधना में भी खोजे न मिला और असंख्य शिल्पी, वास्तुकार, मूर्तिकार, चित्रकार इस दिशा में निरन्तर साधना करते रहे। अन्तिम उन्नीसवीं गुफा कभी पूर्ण न हो सकी। सातवीं सदी ई. में श्री शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने अद्वैतवाद के सिद्धान्त का प्रचार करते हुए ब्रह्मात्मैक्य (ब्रह्मात्म शक्ति) की महत्ता घोषित की। वैसे भी बौद्ध धर्म में फूट, उच्छृंखलता, तंत्र-मंत्र एवं जादू-टोने में घृणित विश्वास पैदा हो जाने और विहार मठों आदि में बसने वाले भिक्षु भिक्षुणियों में व्याभिचार फैल जाने के कारण, अब उसका प्रभाव क्रमशः शिथिल होता जा रहा था। शिक्षा के तीन महाकेन्द्र तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला का अध: पतन हो चुका था। हूणों के नेता मिहिर कुल ने असंख्य बौद्ध भिक्षुओं का वध कराया था, जिससे भयभीत और त्रस्त होकर वे तिब्बत और नेपाल में जा छिपे थे। फलस्वरूप अजन्ता के चैत्य और विहार भी सूने और उपेक्षित हो गए। तत्पश्चात् लगभग 1200 वर्षों तक ये कला मंदिर भयंकर जंगली जानवरों, पक्षियों, मधुमक्खियों, विषैले जन्तुओं और चोर - बदमाशों के आश्रय स्थल बने रहे, जबकि मकड़ियों के जाले, धूल-मिट्टी और गर्द गुबार की मोटी तहें तथा समय की निर्बाध मार विश्व की इस विलक्षण कला को निगल जाने के लिए कटिबद्ध थी।

अजन्ता के इस चित्राधार का उद्घाटन भी अप्रत्याशित ढंग से हुआ। सन् 1819 1820 में मद्रास सैनिक टुकड़ी के एक दस्ते ने, जिसमें अधिकांश यूरोपियन अफसर थे, हैदराबाद और बम्बई स्टेट की मध्यवर्ती एक ग्राम की सीमा पर आक्रमण किया। ग्रामीणों ने डटकर मुकाबला किया और पीछे लौट जाने को विवश कर दिया। इस आशा और विश्वास से कि वे वहाँ कुछ दिन विश्राम करेंगे, घावों की मरहमपट्टी और अपनी शिथिल शक्ति को दुगने वेग से बढ़ायेंगे। युद्ध की दुश्चिन्ताओं से ऊबकर एक नौजवान यूरोपियन अफसर बन्दूक कंधे पर डालकर शिकार के लिये निकल पड़ा। शिकार की टोह में वह निर्जन, घने जंगल में भ्रमण करता रहा। शीघ्र ही उसे एक लोमड़ी की पूँछ दिखाई दी। वह बिना आहट किये पहाड़ी के साथ आगे बढ़ता रहा, जब तक कि पहाड़ी एक ढाल में समाप्त होते दिखाई न दी। वह अब एक ऊँची चट्टान पर पहुँच गया था। लोमड़ी को इधर-उधर खोजा, परन्तु वह लोमड़ी दिखाई न दी। अफसर ने चारों ओर दृष्टि घुमायी और टेढ़े-मेढ़े सर्पाकार जल स्रोत के उस पार नीचे उपत्यका के सामने वाले कक्ष को ध्यान से देखा। उसे महान आश्चर्य हुआ। शताब्दियों पूर्व की अजंता की यह मनोरम कृति पहली बार इस युग के मानव की आँखों में आश्चर्य का रूप बनकर बस गयी। दिव्य शान्ति, दिव्य प्रेम, दिव्य सौन्दर्य में विभोर भगवान बुद्ध साक्षात्कार हुआ। अजंता कंदराओं की एक लम्बी श्रृंखला कला भण्डार को अन्दर छुपाये इस सुनसान, निर्जन स्थान को सुशोभित कर रही थीं। अफसर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, वह सचेत अवस्था में वापस अपने पड़ाव की ओर भागा और छ:- सात सैनिकों को लेकर पुनः उसी स्थान की ओर लौट पड़ा। बड़े कष्ट और श्रम से वे पहाड़ी चढ़ने के पश्चात् अजंता की गुफाओं के प्रवेश द्वार पर पहुँचे। यह चित्रलोक कितना रम्य था, पर कितना सूना। अभी दुनिया यहाँ की रंगीनी से बेखबर थी।

सन् 1840 ई. में एक अन्य अंग्रेज शिकारी इस इलाके में आया और एक युवक गड़रिये की मदद से इन गुफाओं तक पहुँचा जिसने चीते का घर दिखाने का वादा किया था। ये विस्मय कला मंदिर उनकी दृष्टि में पहेली से बनकर झूल गये। तत्पश्चात् सन् 1843 ई. में जेम्स फर्गुसन के लेखों द्वारा दुनिया ने अजंता की जानकारी प्राप्त की। 20 वर्षों तक मेजर रोबर्ट गिल ने अजंता के चित्रों की प्रतिकृति तैयार की किन्तु पाँच चित्रों को छोड़कर सभी आग में जलकर भस्म हो गये। बम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के प्रधान ग्रिफिटस ने भी अपने प्रतिभाशाली छात्रों के साथ इस दिशा में कार्य किया। सन् 1899 ई. में 'अजंता' नाम की पुस्तक प्रकाशित की, किन्तु ठोस कार्य तो तब हुआ जबकि 1914 में निज़ाम सरकार ने अजंता की कलानिधियों की सुरक्षा के लिए पुरातत्व विभाग बनाया, जिसमें भारतीय कलाकारों को विशेष रूप से ट्रेनिंग देकर उसके पुनरुद्धार का भार सौंपा गया। समस्त चित्रों का खजाना यकायक ही प्रकाश में आ गया। जादू सा उन्माद लिये करुणा, त्याग और विश्व मैत्री के प्रतीक भगवान तथागत की जातक कथाओं का अद्भुत अंकन परिलक्षित हुआ। मार- विजय कुमार या गृह-त्याग, काशीराज और नागराज का सामागम, राजप्रसाद का दृश्य, यक्ष, दम्पत्ति का प्रेम, खम्भों के बीच किसी की प्रतीक्षा में खड़ी राजकुमारी, सोलहवीं गुफा में हृदय को द्रवित कर देने वाला 'महाभिनिष्क्रमण' जिसमें सोती हुई यशोधरा और सुकुमार बालक राहुल पर अंतिम दृष्टि- निक्षेप कर उदात्त गांभीर्य लिये बुद्धदेव अमरत्व की खोज में अनन्त पथ पर चल पड़ते हैं, किन्तु सत्रहवीं गुफा में 'बुद्धत्व' की प्राप्ति के पश्चात् भिक्षा पात्र लिये भगवान का पुनः अपने घर में आगमन जिसमें यशोधरा पुत्र के साथ अंजलि पसारे साग्रह उपस्थित हैं, इसके अतिरिक्त मरणासन्न राजकुमारी का करुण दृश्य, पोत- निधन, साँडों की लड़ाई और महाहंस जातक, शिविजातक, षड़दन्त जातक, बेस्संतर जातक के आधार पर बने घटना प्रधान चित्र भी बड़े ही मर्मस्पर्शी और कलात्मक बन पड़े हैं। एक-एक दृश्य में बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित कहानी अंकित हो गई है। नारी का अंकन सर्वत्र मोहक रूप और गौरवपूर्ण बनाया गया है।

आश्चर्य है कि संसार से विरत बौद्ध भिक्षु भी नारी और पुरुष की प्रत्येक क्रिया, भावभंगिमायें, मोड़-तोड़, सौन्दर्य-प्रसाधन, देह-सज्जा, वस्त्राभूषण, केशों को सजाना-संवारना, पोशाक धारण कराना इत्यादि से परिचित थे। राज प्रसादों और जनजीवन की व्यस्तता के बीच उन्होंने प्रकृति के नैसर्गिक उपादानों से भी प्रेरणा ग्रहण की और चित्रण परम्परा में स्नेह, मैत्री, काम, शृंगार, लज्जा, हर्ष, उत्साह, चिंता, आक्रोश, घृणा, ममता, उत्सव, लोकनृत्य, सम्पन्नता- विपन्नता, राग-विराग, आनन्द इत्यादि समस्य क्रियायें दर्शायीं। न सिर्फ राजकीय एवं लौकिक दृश्य अपितु हृदय पर विपरीत प्रभाव डालने वाले विषय भी जैसे आकर्षक राजकुमार और कुटिल नीतिक व्यक्ति योगी, क्रूर, राक्षस और उदात्त, वीर, साध्वी और वारवनिताएँ, राजा- भिखारी, फूल-पत्ती, लतायें, वृक्ष, झाड़-झंखाड़, जलाशय इत्यादि का चित्रण भी किया गया। गुप्तकालीन चित्रकारों ने चित्रण की जो परम्परायें स्थापित कीं वे आज भी भावपक्ष की दृष्टि से विश्व चित्रकला के इतिहास में आदर्श उदाहरण हैं। अजन्ता के चित्रों में जातीय दृष्टि से द्रविण, आदिवासी, दक्खिनी व आर्य आकृतियों के चित्रण के अतिरिक्त सीथियन (Scythian) व पार्थियन (Parthian) आकृतियों का भी बाहुल्य रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क के फलस्वरूप यहाँ के चित्रों में चीनी व तुर्किस्तानी आकृतियाँ भी दृष्टव्य हैं। प्रत्येक का चित्रण उनकी पारम्परिक वेश-भूषा में अत्यन्त वास्तविक तथा स्वाभाविक ढंग से किया गया है। इस तत्व की प्रामाणिकता की पुष्टि कला गुरु कुमारस्वामी के कथन से होती है। उन्होंने लिखा है कि, " गुप्तकाल में कलाकारों ने सभी विदेशी प्रभावों को आत्मसात् कर सदैव के लिये उन्हें भारतीय बना लिया।" देश-विदेश में किसी काल विशेष में अनेक कृतियों की रचनायें होती हैं, उनमें से श्रेष्ठ चित्र ही कला - निधि के रूप में संरक्षित रहते हैं। अजन्ता के चित्रों में वहाँ के शिल्पियों की दृष्टि विश्व और समस्त प्राणी जगत के लिये समान रूप से समन्वित दिखाई पड़ती है और वे दर्शन, जंगत और जीवन के अन्तिम लक्ष्य की अभिव्यक्ति करने में सफल हो सकी है। उनकी कृतियों में उनकी आत्मा अपने आप आलोकित हो उठी है। सम्भवत: इसीलिये अजन्ता की उच्च स्तरीय चित्रकला आज भी अपूर्व निधि के रूप में अक्षुण बनी हुई है।

विशेषता - अजन्ता की कला का सर्वेक्षण करने पर ज्ञात होता है कि वहाँ के चित्रों में आकर्षण, मौलिकता, प्रभावपूर्णता है। वे चित्र भाव पक्ष से सीधा सम्बन्ध रखते हैं। इन चित्रों में भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। सशक्त व लयात्मक रेखांकन, सुरुचिपूर्ण रंग-विन्यास, कुशल छाया-प्रकाश तथा आगामी और स्थिर जन्य लघुतो की विलक्षण कला अजन्ता-चित्रण को पूर्णतया शस्त्रोक प्रस्तुति का स्तर प्रदान करती है। अजन्ता के चित्रों को कला के इतिहास में सर्वोपरि कहा जा सकता है। गुफा नं. 1 में 'पद्मपाणि बोधिसत्व' के चित्र में उनके मुख पर चिन्तनशीलता के चिन्ह तथा गुफा नं. 16 के चित्र 'मरणोन्मुख राजकुमारी' में भाव की गहनता के सन्दर्भ में यूरोपीय कला समीक्षकों ने लिखा है, "फ्लोरेन्स के कलाकार अधिक अच्छा चित्रांकन कर सकते थे तथा वेनिश के कलाकार अधिक अच्छा रंग संयोजन कर सकते थे किन्तु दोनों में से कोई भी अधिक सुन्दर भावात्मक अभिव्यक्ति नहीं कर सका।” अजन्ता के चित्रों में सर्वत्र सरलता और सरसता दर्शनीय है। उनकी चित्रण - विधि अत्यन्त सीधी-सादी है। सौन्दर्य और आध्यात्मिक भावनाओं की दृष्टि से वे श्रेष्ठतम् कृतियाँ मानी जायेंगी। शास्त्रीय निर्देशानुसार प्रतिमाविज्ञान के लक्षणों का पूर्ण निर्वाह किया गया। कलाकारों ने गम्भीर विषयों पर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति की है, भावपक्ष की अभिव्यक्ति को सहृदयता से व्यक्त किया है। उन्होंने श्रेष्ठ कृतियों का चित्रण कर, वहाँ की कला निधि को अमरत्व प्रदान किया। अजन्ता के कलाकार एक मात्र चित्रकार ही नहीं थे वरन् विचारक भी थे। किसी चित्र रचना के पूर्व उनका ध्यान भाव, शैली और नैतिक दृष्टि की ओर रहता था। अजन्ता के चित्र भगवान बुद्ध के सिद्धान्तों का अत्यन्त मार्मिक रहस्यात्मकता से दृष्टव्यों का प्रस्तुतीकरण करते हैं। इन गुफाओं में जातक कथाओं का सर्वाधिक चित्रण किया गया है। जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के पूर्व जीवन की असीम करुणा के दृष्टान्त का विषय लेकर, तत्कालीन कलाकारों ने युग दर्शन, सामाजिक जीवन के मूल्यों और उच्च आदर्शों को जन आकांक्षाओं के अनुरूप चित्रित किया है। इन्हीं जातक कथाओं को अनेक रूपों में भरहुत की वेदिकाओं और सांची के तोरणों में भी उत्कीर्ण किया गया है। डॉ. रामेश्वर वर्मा ने लिखा है कि "इन चित्रों का महत्व इस बात में निहित है कि उस युग के कलाकारों ने अंधेरी गुफाओं में इतनी सफल अभिव्यक्ति किस प्रकार की होगी?"

प्रतीक - अजन्ता की कला प्रतीकात्मक है। उनमें उपादानों और सूक्ष्म प्रतीकों की मनोरम छटा दिखाई पड़ती है। सम्राट अशोक हीनयान सम्प्रदाय का समर्थक था। इस सम्प्रदाय में मूर्ति उपासना वर्जित थी। अतः बुद्ध के प्रतीकों की पूजा की जाती थी। वज्रयान, वृक्ष, चक्र, स्तूप, पद - चिन्ह, कमल, छत्र इत्यादि ऐसे ही उल्लेखनीय प्रतीक हैं। कनिष्क के समय में बौद्ध-धर्म के अनुयायियों में मतभेद के परिणामस्वरूप एक दूसरा शक्तिशाली सम्प्रदाय 'महायान' विकसित हुआ। इस सम्प्रदाय के अनुयायियों ने जन साधारण को जीवन के उच्च मूल्यों के पालन पर बल दिया तथा साधना के लिये बोधिसत्व के जीवन आदर्शों को महत्वपूर्ण बतलाया। 'बोधिसत्व ' का गुण है - दूसरों के कल्याण के लिये अपने कष्टों को कष्ट न मानकर हर सुख का त्याग करना। 'बुद्धत्व' प्राप्त करने के पूर्व सिद्धार्थ ने मानव, पशु व पक्षी योनियों में बोधिसत्व के रूप में अनेक जन्म लिये थे, जिनकी कथायें जातक के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हीं जातक कथाओं का अजन्ता की गुफाओं में भव्य अंकन हुआ है। हंस, हाथी, हिरन, बन्दर आदि का इनके पूर्व जीवन की कथाओं से सम्बन्ध रहा है। उन्हें पवित्रता का प्रतीक मानकर अजन्ता के कलाकारों ने अपनी अगम्य भावनाओं की अभिव्यक्ति की है। हंस पवित्रता का प्रतीक माना गया है। 'कमल' मानव को सांसारिक माया-मोह से निर्लिप्त रहने की भावना का प्रतीक है। 'चक्र' निरन्तर गतिमानता का प्रतीक (संकेत) है। 'स्वस्तिक' एवं 'मीन' शुभ के द्योतक हैं। बौद्ध धर्मावलम्बियों के विषय में यह उल्लेखनीय है कि वे अन्य समकालीन धर्मों के देवताओं के प्रति सदैव उदार रहे। उस समय के लोक सम्प्रदायों व ब्राह्मण धर्म के आराध्य देवताओं के प्रति सहिष्णु भावना होने से वही आदर्श बौद्ध कला में प्रतिबिम्बित होते हैं, जिनसे एक नये जीवन-दर्शन का संकेत मिलता है। बौद्ध शिल्पकला और चित्रकला दोनों में लोक सम्प्रदायों के प्रमुख देवता यक्ष तथा नाग अनेक स्थलों पर दर्शाये गये हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका स्तर सदैव बुद्ध के सहायक, सेवक अथवा भक्त के रूप में देखने को मिलता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार देवालयों अथवा चैत्य के द्वारपाल की स्थिति में या बुद्ध की आराधना करते हुए। ब्राह्मण- देवताओं में ‘इन्द्र’ प्रायः एकमात्र उपदेश देते हुए अथवा बुद्ध के श्रोता समूह में दृष्टव्य हैं। इसी प्रकार 'शिव' भी एक स्थल पर दर्शाये गये हैं। 'ब्रह्मा' एक स्थान पर श्रोता समूह में दृष्टव्य हैं और एक स्थान पर बुद्ध जन्म के दृश्य मंि शिशु पर छत्र (बुद्ध के राजस्व के प्रतीक रूप में) पकड़े हुए हैं।

बोधिसत्वों में अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, वज्रपाणि, मैत्रेय, सामन्तभद्र अधिक प्रसिद्ध हैं। भारतवर्ष में देवताओं की अपेक्षा 'देवियों' को उच्च स्थान प्राप्त है। बौद्ध धर्म में भी देवियों को अधिक महत्व दिया गया है। देवियों में 'तारा' का प्रमुख स्थान है। तांत्रिक बौद्धों ने देवी 'तारा' को उदार और कान्तिवान माना है। इनको सुख, समृद्धि व धन की देवी 'लक्ष्मी' कहा गया है। 'श्याम तारा' को सौन्दर्य का प्रतीक माना गया है। स्त्रियों में इनकी उपासना सौन्दर्य रक्षा हेतु की जाती है। इन्हें धन-दायिनी भी कहा जाता है। 'देवी सितारा' रौद्रता की प्रतीक हैं।

नारी अंकन - अजन्ता की चित्रकला में नारी अंकन विशद् - विविधता के साथ सम्पन्न है। उनकी वेश-भूषा, आभूषण, केश विन्यास, शारीरिक संरचना विलक्षण है। मुख मंडल पर शौर्य, ऐश्वर्य एवं आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति सर्वत्र विषयानुकूल हुई है। उनमें दैहिक एवं आध्यात्मिक सौन्दर्य का संतुलन है और सौम्य, शान्त, करुणा, हर्ष - विषाद सभी भावों में एकरसता दृष्टव्य है। नैतिक प्रतिष्ठा और नारी मर्यादा की दृष्टि से वे श्रेष्ठतम् चित्र माने गये हैं। चित्रकला की भाँति मूर्तिकला में नारी सौन्दर्य का सर्वाधिक महत्व है। जहाँ कहीं भी शालभंजिका और नायिकाओं की प्रतिमायें उत्कीर्ण की गयी हैं उनका अपना अलग सौन्दर्य दिखाई पड़ता है। शालभंजिका का विकास बौद्ध स्तूपों की वृक्षिका - मूर्तियों से हुआ है। उन्हें नारी की त्रिभंग मुद्रा में आम्र, कदम्ब, शाल व अशोक के वृक्षों के नीचे, हाथ में वृक्ष की डाल पकड़े हुए दर्शाया गया है, साथ ही यहाँ के शिल्पियों ने मनुष्य की सहज भावनाओं, लालसाओं, उद्वेग, प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए नायिकाओं की मूर्तियाँ उकेरी (बनायी) हैं। इन प्रतिमाओं में श्रृंगार रस का मार्मिक व हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है और प्रतीक रूप में सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। के.के. जसवानी ने अपनी पुस्तक 'कला की परख' में लिखा है कि "अजन्ता के भिक्षु कलाकारों के लिये सौन्दर्य और जीवन दोनों ही समान रूप से अखण्ड थे। उनके समक्ष शारीरिक और आध्यात्मिक सौन्दर्य की दूरी विलुप्त हो चुकी थी। नारी के प्रति सहानुभूति और श्रद्धा अजंता से बढ़कर कहीं और भी समर्पित की गयी है। यहाँ वह केवल नारी मात्र ही नहीं है अपितु वह विश्व के बिखरे सौन्दर्य का प्रतीक भी है।"

दिनेश चन्द गुप्त के अनुसार" अजन्ता की नारी शारीरिक सौन्दर्य के आदर्श रूप में अंकित है। ग्रीक चित्रांकन यद्यपि अजन्ता के समान ही शारीरिक सौन्दर्य के परम उत्कर्ष को लिये हुये है पर उनमें भारतीय सौन्दर्यगत सूक्ष्मता का आभास नहीं मिलता।"

केश विन्यास - केश विन्यास नारी सौन्दर्य का मुख्य उपादान है। केश सज्जा में अजन्ता के चित्रकारों ने अपनी प्रतिभा का अनूठा परिचय दिया है। उनकी केशसज्जा हेतु उनमें मोतियों, पुष्पों इत्यादि का स्वतंत्र विधि से अलंकरण किया गया है। युगों-युगों की इस प्राचीन केश- सज्जा से आज भी देश-विदेश की नारियाँ प्रभावित होकर उनका अनुकरण करती हैं। इसी प्रकार का केश विन्यास साँची, भरहुत, अमरावती और मथुरा की नारी मूर्तियों में देखा जा सकता है। उनमें विभिन्न प्रकार के बालों के गुँहने जैसे ऊपर की ओर जूड़ा बाँधने की कला और फूलों व मणि मोतियों से उनकी सजावट, अनायास ही नारी और सहृदय कलाकार को अपनी ओर आकृष्ट करने में पूर्णतया सक्षम है।

मुद्रायें अजन्ता के प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों की सर्वोपरि उपलब्धि नर-नारियों की विभिन्न मुद्राओं को दर्शाने में निहित है। चित्र मूक अवश्य हैं, परन्तु उंगुलियों के थोड़े से घुमाव ने उसके भावों की गहनता को सर्वाधिक ऊँचाई दी। हाथ में पात्र, चमर व कमल दण्ड धारण किये हुये एवं हाथों से लताओं का स्पर्श करती हुई नारियों की अनेक मुद्राओं का अजन्ता की कला में अक्षुण्य भण्डार है जो उनके रहस्यमयी जीवन की चेष्टाओं को उद्घाटित करता है। विभिन्न आसनों और मुद्राओं में भगवान बुद्ध और बोधिसत्व की प्रतिमायें सूक्ष्मता की चरम सीमा तक पहुँच गई हैं। ये मुद्रायें अपने में अत्यधिक सुन्दर हैं। इसका अनुमान लगाना सम्भव नहीं है।

आलेखन एवं अलंकरण - अजन्ता में छतों की चाँदनी, प्रत्येक कोना, स्तम्भ व कोई ऐसा स्थान नहीं है जो विविध पशु-पक्षी, वृक्ष-लताओं, कमल पुष्पों के अलंकरण से युक्त न हो। लहरदार कमल दण्डों के मध्य क्रीड़ा-रत हंस, मकर, मीन, हिरन व अप्सराओं के चित्र जिस कुशलतापूर्वक चित्रित किये गये हैं वे अद्वितीय हैं। विभिन्न जीव-जन्तुओं को उचित स्थान देकर उन कलाकारों ने अजन्ता की चित्रकला को गौरव प्रदान किया है। हजारों की संख्या में अंकित यहाँ के कमल किसी से समता नहीं रखते। वे एक मात्र सौन्दर्य के द्योतक ही नहीं हैं वरन् गम्भीर भावों के साक्षी भी हैं इस प्रकार अनेक पशु-पक्षियों का अंकन भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों का स्मरण दिलाते हैं। साथ ही साथ यथार्थ को जिस ढंग से मूर्त रूप प्रदान किया गया है, वह अत्यन्त मनोहारी है।

विदेशी प्रभाव -  भारतीय वाणिज्य के अन्तर्गत पश्चिम में रोम साम्राज्य व फारस आदि देशों से तथा पूर्व व उत्तर में मंगोलिया तथा चीन तक से घनिष्ठ सम्पर्क था। अतएव उन समस्त देशों से सांस्कृतिक व कला परम्पराओं का आदान-प्रदान होना स्वाभाविक था, किन्तु भारतीय कलाकारों ने उन सभी विदेशी कला परम्पराओं का स्वदेशी परम्पराओं में ऐसा कुशलतापूर्वक मिश्रण किया कि वे भारतीय परम्पराओं के विकास के रूप में ही प्रकट हुयीं। ऐसा मिश्रण अधिकतर मूल भाव (Motifs) के चित्रण में दृष्टव्य है। उनमें पशु व पक्षियों के चित्रण, ज्यामितीय आभूषण, काल्पनिकता पर्याप्त मात्रा में दृष्टव्य है। इसके अतिरिक्त अजन्ता के चित्रों में विदेशी विशिष्ट शैलियों की झलक कहीं-कहीं स्पष्ट होती है। उदाहरणस्वरूप रेखांकन में चीनी परम्परा का प्रभाव तथा सुन्दर शारीरिक सौष्ठव का आकर्षण चित्रण रोमन परम्परा (Roman Tradition) का स्मरण दिलाता है। उत्तर-पश्चिमी भारत में रोमनोग्रीक गांधार शैली का विकास हो चुका था। यद्यपि गांधार शैली भारतीय बन चुकी थी। फिर भी उसमें विदेशी तत्व विदेशी देन ही माना जाना चाहिए। अजन्ता के चित्रों में कहीं-कहीं गांधार शैली का प्रभाव भी झलकता है।

रेखायें - अजन्ता के कलाकारों ने अपनी अभिव्यक्ति हेतु रेखांकन विधि को महत्व दिया है। वे चित्र को हृदय पटल पर उतारने के पश्चात् उनके स्वरूपों को रेखांकित कर तूलिका स्पर्श से अपने भावों को मूर्तिमान करते थे। सरल व स्वाभाविक रेखायें उन कलाकारों की श्रेष्ठता की प्रतीक हैं। उनकी रेखाओं में प्रवाह और शैली की सजीवता है। अटूट और भव्य रेखाओं का जितना सजीव, सशक्त और सौन्दर्यपूर्ण अंकन अजंता के चित्रों में हुआ है अन्यत्र किसी भी देश की कला के इतिहास में दुर्लभ है। उन कलाकारों ने अपनी आन्तरिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति एक मात्र रेखांकन विधि द्वारा की है, जो अत्यन्त भावपूर्ण है।

भाव - अजन्ता के चित्र भाव प्रदर्शन के लिये विश्व-विख्यात हैं। वहाँ की भित्तियों पर न जाने कितनी ही नारियों की छवियों में उनकी उत्कंठा, ग्लानि, बेचैनी, हर्ष-विषाद के चित्र दृष्टव्य हैं, जिनका दर्शक के अंतर्मन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उनमें असीम जीवन के साथ- साथ उस युग के कलाकारों की निजी अनुभूति और सहज संवेदना का भी प्रदर्शन हुआ है। साथ ही साथ उन चित्रों में आन्तरिक भाव व्यंजना को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है जो चित्रकार की अंतर्निहित भावना, प्राकृतिक अनुराग और मनोवैज्ञानिक अनुभूति की सूक्ष्म और विशद व्याख्या करते हैं।

प्रतिमा विज्ञान - शिल्पशास्त्र के अनुसार चित्रकला और मूर्तिकला में महत्वपूर्ण अंतर नहीं है। दोनों ही कलाओं का उद्देश्य बाह्य सौन्दर्य का सृजन न कर रस प्रतिपादन करना रहा है। अजंता की चित्रकला में भगवान बुद्ध तथा अन्य सम्प्रदाओं के देवी-देवताओं के अंकन में प्रतिमा विज्ञान के निर्देशनों का अनुशीलन हुआ है। ऋषि कलाकारों ने उनकी संरचना की। उनमें से कई ग्रन्थ नष्ट हो गये, किन्तु छिन्न-भिन्न अवस्था में भारतीय और चीनी सम्प्रदाय द्वारा संरक्षित जो सामग्री उपलब्ध है वह मौलिक है। मुद्रायें, आभूषणों, वस्त्रों, आयुधों सुख आकृतियों व उनकी माप के लिए जो निर्देश दिये गये, उनका पालन करना हर शिल्पी और चित्रकार के लिए आवश्यक है, किन्तु अजन्ता के चित्रों का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि नारी चित्रण में (सौन्दर्य की दृष्टि से) शास्त्रों में वर्णित निर्देशनों से बाधित न होकर उन कलाकारों ने अपनी भावात्मक प्रक्रियाओं की अभिव्यक्ति की है।

षड़ांग (चित्रकला के छ: अंग) - भारतीय कला में षड़ाग कब से प्रचलित हैं, इसका अनुमान लगाना कठिन है। प्राचीन उल्लेखों एवं कामसूत्र में प्राप्त विवरणों से ज्ञात होता है कि उनकी रचना के पूर्व भारतीय चित्रकला में षड़ांग प्रचलित रहे होंगे। चीन और जापान की चित्रकला में षड़ांग दर्शन की रचना अनुमानतः भारत से बाद की है। अजन्ता की चित्रकला में छ: अंग मेरुदण्ड के समान हैं। यशोधर नामक एक विद्वान ने वात्स्यायन के कामसूत्र पर टीका की है। चित्रकार को कला के छ: अंगों के विषय पर विशेष ध्यान देना चाहिए। रूपभेद, प्रमाण, भाव, सादृश्य, लावण्य-योजना ओर वर्णिका भंग, कला के प्रमुख छ: अंग हैं। रूपभेद का अर्थ अंग-प्रत्यंग की योजना, प्रमाण का अर्थ अंगों की रचना का आनुपातिक सिद्धान्त, भाव का अर्थ - 'भाव-व्यंजना' लावण्य का अर्थ- माधुर्य तथा वर्णिका भंग का अर्थ 'रंगों व तूलिका की विविधता और प्रयोग से है।

अजंता की गुफाओं में दीवारों पर मोटा प्रलेप किया गया है। कई रंगों के मिश्रण से चित्र संरचना की गई है रंग प्राय: मिट्टी, फूल-पत्ती, वृक्ष की जड़ों और प्राकृतिक प्रदत्त स्वाभाविक रंगों के योग से तैयार किये जाते थे। दीवारों का निर्माण खास तौर से चित्रों के लिए ही किया गया प्रतीत होता है। बीसवीं गुफा में यक्ष, सुपर्ण, विद्याधर, गंधर्व, किन्नर और अप्सराओं के चित्रों के अतिरिक्त दौड़ते हाथियों का दृश्य इतना सजीव है कि उनकी घंटियाँ और पीठ का हौंद उनकी द्रुत गति के कारण उसी अनुपात से नीचे खिसक गया है। प्रत्येक विवरण अत्यधिक बारीकी, कुशलता से चित्रित किया गया है। सबसे अधिक विचारणीय प्रश्न यह है कि किस प्रकार कलाकारों ने इन अँधेरी गुफाओं में इतने सूक्ष्म रंगों, रेखाओं और व्यौरों को भरा होगा? कैसे वे रंगों के चयन में सफल हुए? किस प्रकार उन्होंने सजीवता और सौन्दर्य का जादू मूर्तवान् कर दिया? प्रत्येक गुफा में एक छोटा-सा प्रवेश द्वार है और किसी-किसी गुफा में एक या दो छोटे-छोटे झरोखे हैं। निश्चय ही मशालों का उपयोग यहाँ नहीं किया गया क्योंकि धुएँ आदि का कोई भी चिन्ह यहाँ नहीं मिलता। अन्ततः हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सहस्रों वर्ष पूर्व संभवत: हमारे पूर्वजों की नेत्र ज्योति इतनी तीक्ष्ण रही हो कि वे मिट्टी के दीपक अथवा प्रकृत धूमिल प्रकाश में भी भली-भाँति देख सकते थे जो कि आज हम बिजली की तेज़ रोशनी में भी कठिनता से देख पाते हैं। अंजता के इन अज्ञात कला-शिल्पियों ने साधना की तल्लीनता में उन शाश्वत सार्वभौम सत्यों को आत्मसात् कर, उन अमिट रेखाओं में व्यक्त किया जो किसी भी काल में मिथ्या सिद्ध नहीं हो सकते। अजंता की कला का प्रभाव इतना व्यापक था कि दक्षिण में सिद्धनिवास गुफा, मध्य एशिया में खोतन, मीरान, तुर्फान और त्वनहान की सहस्र बुद्ध गुफायें तथा कोलम्बिया में अंघोर सिंहल की सिगिरिया गुफाओं पर उनकी स्पष्ट छाप दृष्टव्य है। भारत में बाघ, बादामी, जोगीमारा, सित्तनवासन, एलोरा आदि की गुफाओं में एक लम्बे अर्से (समय) तक अजंता की चित्रण परम्परा चलती रही। ग्वालियर में बाघ गुफाओं के भित्ति चित्र कला शिल्प, रेखा विन्यास और भाव व्यंजना में अजंता के समक्ष कोई नहीं है, परन्तु एलोरा की गुफायें तो (जिनका स्थानीय नाम वेरूल) है, ब्राह्मणों द्वारा मानो अजंता का उत्तर देने के लिए ही बनवाई गई थीं। वैसे तो ब्राह्मणों और बौद्धों में मत- वैमत्य के कारण अजंता और एलोरा में भी कुछ अंतर आ गया है, लेकिन देवत्व की कल्पना और दार्शनिक चिन्तन की परिणति में कोई विशेष भिन्नता नहीं है। अजंता से कुछ मील दूर एक विशाल ढालुए पहाड़ को काटकर एलोरा गुफाओं का निर्माण हुआ है। यहाँ बौद्ध ब्राह्मण और जैन कला का अद्भुत सामंजस्य दृष्टव्य है। सर्वप्रथम बारह बौद्ध गुफायें हैं, जिनमें भगवान बुद्ध की प्रतिमा, स्तूप और साधन - रत भिक्षुओं के लिये दो मंजिले विहार बने हैं, फिर सत्रह ब्राह्मणों की गुफायें हैं और अन्त में पाँच गुफायें जैनियों की हैं। एलोरा का सबसे विलक्षण और प्रतिभावान कैलाश मंदिर है जो ढाई सौ फुट लम्बे, डेढ़ सौ फुट चौड़े और सौ फुट गहरे पर्वत को काटकर तैयार किया गया है। उसके मध्य में शिवलिंग प्रतिष्ठित है, ऊपर शिखर है और सोलह स्तम्भों पर पटा हुआ मंडप है। पास ही अलग से नंदी मंडप बना है। इसके आस-पास और भी पाँच छोटे मंदिर हैं, जिनमें पार्वती माँ, श्री गणेश भगवान जी, रूद्र, चन्द्र और सप्त मातृका की मूर्तियाँ विराजमान हैं। तीन विशाल गैलरियों में जिनके भीतरी कक्ष परकोटे से काटकर बनाए गए हैं, बयालिस पौराणिक चित्र हैं। साथ ही हिन्दुओं के देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएँ और रामायण, महाभारत, पुराण इत्यादि के आख्यानात्मक दृश्य - चित्र अंकित हैं। रावण के कैलाश पर्वत उठाने का दृश्य बड़ा ही मनोरम है। रावण अपनी पूरी ताकत से पर्वत उठाये है, पार्वती भयभीत हो भगवान शिव के भुजदण्डों की शरण ले रही हैं, किन्तु शिव गंभीर शान्त मुद्रा में चरण से चाप कर उसे स्थिर कर देते हैं रावण की दूसरी स्थिति भी दर्शनीय है। शिव को प्रसन्न करने के लिये वह अपने सिर काट-काट कर चढ़ा रहा है। क्रुद्ध वीरभद्र का दक्ष प्रजापति का यज्ञ- विध्वंस और पन्द्रहवीं गुफा में शिव का ताण्डव नृत्य बड़ा ही सजीव व मनोहारी है।

इस मंदिर की बनावट हिमाच्छादित हिमालय की सी है और पास ही एक नदी का उद्गम हुआ है। अतएव इसमें कैलाश पर्वत का सजीव दृश्य अंकित किया गया है। यह मंदिर हिन्दुओं का महान तीर्थ समझा जाता है। मंदिर का प्रत्येक भाग शिल्पकला के उत्तमोत्तम प्रतीकों से पूर्ण है बल्कि अपनी कारीगरी, शिल्प और स्थापत्य के कारण ही यह कलाप्रेमियों की पुण्यभूमि बन गया है। इसके समीप ही 'रामेश्वर' और 'सीता की नहानी' आदि प्रसिद्ध गुफायें हैं, जिससे मंदिर की मनोमुग्धकारिता द्विगुणित (दुगनी) हो गई है। नवम् सदी में यहाँ जैन-धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ भी बनाई गईं। जैनियों के चौबीसवें तीर्थकर महावीर की चतुर्भुजी प्रतिमा यहाँ प्रतिष्ठित है। जैनियों की दो प्रधान गुफाएँ 'इन्द्रसभा' और 'जगन्नाथ सभा' भी अधिक प्रसिद्ध हैं। इसके द्वार की निर्माण पद्धति में कैलाश मंदिर का अनुकरण स्पष्ट दृष्टिगत है। गुप्तकाल से लेकर बाद की पाँच-छः शताब्दियों तक कला अत्यन्त सशक्त रूप से उजागर हुई थी। चित्रकला के साथ-साथ वास्तुकला, पत्थर और धातु का काम इतना विकसित हुआ कि सूक्ष्मता और सौष्ठव इस पराकाष्ठा पर पहले दृष्टिगत नहीं हुआ। झाँसी जिले में वेत्रवती नदी के किनारे देवगढ़ नामक ग्राम में गुप्त राजाओं का बनवाया हुआ एक बहुत ही सुन्दर दशावतार मंदिर है। मंदिर के द्वार - तोरण, पार्श्व स्तम्भ और बाहरी प्राचीर (दीवार) की तरफ तीन शिलापट्टों पर आश्चर्यजनक मूर्तियाँ अंकित हैं। द्वार के शीर्ष पर विष्णु की मूर्ति, पार्श्व स्तम्भों पर प्रतिहारी मूर्तियाँ, मंगल घट, श्रीवृक्ष का मनोहारी अलंकरण, युगल स्तम्भों पर गंगा-यमुना की मूर्तियों, शिलापट्टों पर शेषशायी विष्णु के चरण दबाती हुई लक्ष्मी, नाभि-कमल पर विराजमान ब्रह्मा तथा पास ही खड़े हुए शिव, गजेन्द्र-मोक्ष, नर-नारायण की तपश्चर्या, अहल्योद्वार के दृश्य सजीवतापूर्ण एवं हृदयस्पर्शी हैं। कानपुर के समीप भीतरगाँव में ईंटों का बना हुआ मंदिर है, जिसकी मूर्तियाँ अपेक्षाकृत स्वाभाविक और आडम्बरहीन हैं। इस युग के दो सुप्रसिद्ध कला - केन्द्र एलिफैंटा के गुफा मंदिर और दक्षिण में कांची के समक्ष समुद्र तट पर मामल्ल्पुरम् में चट्टानों से काटे गये विशाल मंदिर - रथ हैं। कांचीपुरी के सप्तरथ भी, वास्तुकला की दृष्टि से अद्वितीय हैं।

पीतल, कांसे और लोहे की कारीगरी भी इस युग में चरमोन्नति पर थी। दिल्ली में कुतुब मीनार के पास जो लौह स्तम्भ है वह इसी समय का है। उसकी बनावट, साँचे में ढालने की प्रक्रिया, चिकनाहट और चमक ऐसी अद्भुत है कि आज तक उस पर जंग और खरोचों का नामोनिशान तक नहीं है। कला की यह उदान्त परम्परा क्रमशः हास को प्राप्त होती गई। अजंता का रेखांकन, रंग-विधान, आकृतियों की सजीवता और सुष्ठ शैली में पहले जैसा गतिवेग और सप्राणता न रही और उसका अपभ्रंश रूप सुस्थिर हो गया। चित्रकला अधिकतर लाक्षणिक अर्थों में प्रयुक्त होने लगी, जिससे पहले की अंतर्भूत कल्पना का प्रकाश लुप्त होता चला गया।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तिकला के विषय में आप क्या जानते हैं?
  2. प्रश्न- कांस्य कला (Bronze Art) के विषय में आप क्या जानते हैं? बताइये।
  3. प्रश्न- कांस्य मूर्तिकला के विषय में बताइये। इसका उपयोग मूर्तियों एवं अन्य पात्रों में किस प्रकार किया गया है?
  4. प्रश्न- कांस्य की भौगोलिक विभाजन के आधार पर क्या विशेषतायें हैं?
  5. प्रश्न- पूर्व मौर्यकालीन कला अवशेष के विषय में आप क्या जानते हैं?
  6. प्रश्न- भारतीय मूर्तिशिल्प की पूर्व पीठिका बताइये?
  7. प्रश्न- शुंग काल के विषय में बताइये।
  8. प्रश्न- शुंग-सातवाहन काल क्यों प्रसिद्ध है? इसके अन्तर्गत साँची का स्तूप के विषय में आप क्या जानते हैं?
  9. प्रश्न- शुंगकालीन मूर्तिकला का प्रमुख केन्द्र भरहुत के विषय में आप क्या जानते हैं?
  10. प्रश्न- अमरावती स्तूप के विषय में आप क्या जानते हैं? उल्लेख कीजिए।
  11. प्रश्न- इक्ष्वाकु युगीन कला के अन्तर्गत नागार्जुन कोंडा का स्तूप के विषय में बताइए।
  12. प्रश्न- कुषाण काल में कलागत शैली पर प्रकाश डालिये।
  13. प्रश्न- कुषाण मूर्तिकला का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  14. प्रश्न- कुषाण कालीन सूर्य प्रतिमा पर प्रकाश डालिये।
  15. प्रश्न- गान्धार शैली के विषय में आप क्या जानते हैं?
  16. प्रश्न- मथुरा शैली या स्थापत्य कला किसे कहते हैं?
  17. प्रश्न- गांधार कला के विभिन्न पक्षों की विवेचना कीजिए।
  18. प्रश्न- मथुरा कला शैली पर प्रकाश डालिए।
  19. प्रश्न- गांधार कला एवं मथुरा कला शैली की विभिन्नताओं पर एक विस्तृत लेख लिखिये।
  20. प्रश्न- मथुरा कला शैली की विषय वस्तु पर टिप्पणी लिखिये।
  21. प्रश्न- मथुरा कला शैली की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  22. प्रश्न- मथुरा कला शैली में निर्मित शिव मूर्तियों पर टिप्पणी लिखिए।
  23. प्रश्न- गांधार कला पर टिप्पणी लिखिए।
  24. प्रश्न- गांधार कला शैली के मुख्य लक्षण बताइये।
  25. प्रश्न- गांधार कला शैली के वर्ण विषय पर टिप्पणी लिखिए।
  26. प्रश्न- गुप्त काल का परिचय दीजिए।
  27. प्रश्न- "गुप्तकालीन कला को भारत का स्वर्ण युग कहा गया है।" इस कथन की पुष्टि कीजिए।
  28. प्रश्न- अजन्ता की खोज कब और किस प्रकार हुई? इसकी प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करिये।
  29. प्रश्न- भारतीय कला में मुद्राओं का क्या महत्व है?
  30. प्रश्न- भारतीय कला में चित्रित बुद्ध का रूप एवं बौद्ध मत के विषय में अपने विचार दीजिए।
  31. प्रश्न- मध्यकालीन, सी. 600 विषय पर प्रकाश डालिए।
  32. प्रश्न- यक्ष और यक्षणी प्रतिमाओं के विषय में आप क्या जानते हैं? बताइये।

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